लखनऊ इलाहाबाद उच्च न्यायालय खंडपीठ लखनऊ हाई कोर्ट के जस्टिस राजेश सिंह चौहान एवं देवेश चंद्र सावंत की डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता कर्मेश प्रताप सिंह की ओर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट Rreena N Singh व प्रदीप कुमार दुबे के अधिवक्ता को सुनने के बाद प्रमुख सचिव के पद पर प्रदीप दुबे की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका स्वीकार कर ली।
कर्मेश प्रताप सिंह को अंतरिम राहत देते हुए मामले में विधानसभा अध्यक्ष और प्रमुख सचिव को नोटिस जारी कर दिया।
मामले की अगली सुनवाई 6 जुलाई को होगी।
लखनऊ हाई कोर्ट के कक्ष संख्या 9 में करीब आधे घंटे तक चली गर्मागर्म बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट रीना एन सिंह ने कोर्ट को बताया कि मामला उत्तर प्रदेश की विधानसभा के प्रमुख सचिव के पद पर अवैध नियुक्ति से जुड़ा हुआ है इसलिए मामले में माननीय न्यायालय का हस्तक्षेप अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने न्यायालय से प्रमुख सचिव विधानसभा प्रदीप दुबे को याचिका के अंतिम निस्तारण तक किसी भी शक्ति, प्रशासनिक अथवा आधिकारिक कार्य, करने से रोकने की मांग की।
इसके अलावा एडवोकेट रीना एन सिंह ने न्यायालय से याचिका के लंबित रहने के दौरान प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे जो मामले में प्रतिवादी संख्या तीन है उनकी नियुक्ति के संचालन/प्रभाव को स्थगित करने की मांग की।
प्रदीप कुमार दुबे के अधिवक्ता के द्वारा याचिका की पोषणीयता पर सवाल उठाया गया दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं को सुनने के बाद न्यायालय ने प्रतिवादी को नोटिस जारी किया अब मामले की अगली सुनवाई 7 जुलाई को होगी।
सोमवार को इसी मामले पर जब सुनवाई शुरू हुई तो जस्टिस जसप्रीत सिंह और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला ने अपने मामले को इस याचिका से अलग करने की मांग मुख्य न्यायाधीश से की थी।
इसके बाद नई डिवीजन बेंच को यह मामला स्थानांतरित किया गया। याचिकाकर्ता कर्मेश प्रताप सिंह ने एडवोकेट रीना एन सिंह के माध्यम से
क्वो वारंटों (अधिकार पृच्छा) के तहत लखनऊ हाई कोर्ट में विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे की नियुक्ति को अवैधानिक बताते हुए चुनौती दी है।
क्या है मामला –
विधानसभा अध्यक्ष के पूर्व सूचना अधिकारी रहे कर्मेश प्रताप सिंह का कहना है कि वर्ष 2009 में दुबे की नियुक्ति विधानसभा सचिवालय (भर्ती एवं सेवा शर्तें)नियमावली, 1974 की अनदेखीकरते हुए की गई थी। नियमावली के अनुसार चयन श्रेणी के पदों पर नियुक्ति के लिए अधिकतम आयु 52 वर्ष निर्धारित थी, जबकि नियुक्ति के समय उनकी आयु इससे अधिक थी। दुबे ने 13 जनवरी 2009 को उप्र न्यायिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) ली थी।
उसी दिन उन्हें प्रमुख सचिव (संसदीय कार्य) नियुक्त किया गया और छह दिन बाद, 19 जनवरी 2009 को विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव का प्रभार भी सौंप दिया गया। यह पूरी प्रक्रिया बिना विज्ञापन, प्रतिस्पर्धी चयन, लोक सेवा आयोग से परामर्श तथा संविधान के अनुच्छेद-187 के तहत आवश्यक अनुमोदन के पूरी की गई। याचिका में वर्ष 2010-11 में विधानसभा सचिवालय सेवा नियमों में किए गए कथित पांचवें संशोधन पर भी सवाल उठाए गए हैं। दावा किया गया है कि इन संशोधनों को विधानसभा के पटल पर रखा ही नहीं गया और इन्हीं के आधार पर
दुबे को लगातार सेवा विस्तार दिया गई जाता रहा। वर्ष 2011 में लागू की ‘सर्विस ट्रांसफर’ व्यवस्था को भी नियमों के विपरीत बताते हुए कहा गया है कि इसी के माध्यम से उनकी स्थिति नियमित करने का प्रयास किया गया। दुबे 30 अप्रैल 2019 को 62 वर्ष की आयु पूरी कर सेवानिवृत्त हो चुके थे। बाद में 17 मार्च 2020 को जारी अधिसूचना के तहत सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष किए जाने का लाभ भी उन्हें नहीं मिल सकता था। इसके बावजूद वह आज भी प्रमुख सचिव पद पर कार्यरत हैं, जबकि उनकी आयु 68 वर्ष से अधिक बताई गई है। दुबे को प्रमुख सचिव पद पर बने रहने का कानूनी अधिकार सिद्ध करने का निर्देश देने के लिए हाई कोर्ट से क्वो वारंटो रिट जारी करने की मांग की गई है।
