सनातन धर्म में एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है, लेकिन अधिक मास में आने वाली परमा एकादशी को अत्यंत पुण्यदायी और मोक्ष प्रदान करने वाली माना जाता है। पद्म पुराण के अनुसार प्राचीन समय में कांपिल्य नगर में सुमेधा नाम के एक ब्राह्मण अपनी धर्मपत्नी पवित्रा के साथ रहते थे। दोनों अत्यंत धार्मिक, दयालु और भगवान विष्णु के परम भक्त थे, लेकिन उनका जीवन अत्यंत गरीबी में बीत रहा था।

घर में भोजन तक की व्यवस्था नहीं हो पाती थी, फिर भी पवित्रा अपने पति की सेवा और भगवान की भक्ति में सदैव लगी रहती थीं। एक दिन महर्षि कौण्डिन्य उनके घर पधारे। दंपति ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनका आदर-सत्कार किया। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर महर्षि ने उन्हें परमा एकादशी व्रत का महत्व बताया और श्रद्धा-भक्ति के साथ यह व्रत करने की सलाह दी।

महर्षि के बताए अनुसार दोनों ने पूर्ण श्रद्धा से परमा एकादशी का व्रत किया, भगवान श्रीहरि विष्णु का पूजन किया, रात्रि जागरण किया और द्वादशी के दिन विधिपूर्वक पारण किया। व्रत के प्रभाव से उनकी दरिद्रता दूर हो गई, घर में सुख-समृद्धि का आगमन हुआ और उन्हें जीवन में सभी प्रकार के सुख प्राप्त हुए। अंत समय में भगवान विष्णु की कृपा से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।

परमा एकादशी हमें यह संदेश देती है कि सच्ची श्रद्धा, भक्ति और भगवान पर अटूट विश्वास रखने वाले भक्तों पर श्रीहरि की कृपा अवश्य बरसती है। इस पावन दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से पापों का नाश होता है, सुख-समृद्धि प्राप्त होती है तथा जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

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