उत्तराखंड गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए करीब चार दशक से चल रहे सरकारी अभियानों और हजारों करोड़ रुपए के खर्च के बावजूद नदी को स्वच्छ बनाने का लक्ष्य अधूरा है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की ताजा परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट ने उत्तराखंड में केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी नमामि गंगे योजना के क्रियान्वयन में गंभीर कमियों का खुलासा किया है।
केंद्र सरकार के प्रमुख “नमामि गंगे” कार्यक्रम के तहत भारी-भरकम वित्तीय आवंटन के बावजूद उत्तराखंड राज्य गंगा को स्वच्छ रखने में सफल नहीं हो पाया है लिहाजा गंगा नदी की उद्गम धारा को ही गंभीर घरेलू प्रदूषण झेलना पड़ रहा है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की उत्तराखंड ऑडिट पर केंद्रित ताजा रिपोर्ट के अनुसार राज्य के एक-तिहाई से अधिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) बिना उपचारित गंदा पानी सीधे नदी में छोड़ रहे हैं।
गंगा नदी में प्रदूषण को नियंत्रित करने के उद्देश्य से वर्ष 2014 में “नमामि गंगे” कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी। इस योजना के तहत गंगा बेसिन के सभी राज्यों को इस बात के लिए धनराशि दी जाती है कि वे ऐसे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करें जो अपशिष्ट जल को नदी में छोड़े जाने से पहले उसका शोधन कर सकें। इसके अलावा गंगा किनारे बसे शहरों की सीवर व्यवस्था को भी बेहतर बनाया जा सके।
वर्ष 2017 में केंद्र सरकार ने गंगा बेसिन के सभी राज्यों का ऑडिट कराया था, जिसमें सभी गंगा राज्यों में नदी में प्रदूषण के उच्च स्तर पाए गए थे। रिपोर्ट में बिना उपचारित सीवेज के प्रवाह को रोकने के लिए कई सिफारिशें भी की गई थीं। हालांकि, अन्य राज्यों की अब तक कोई ऑडिट नहीं हुई है और उत्तराखंड की ताजा ऑडिट से पता चलता है कि राज्य में नगरपालिका कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण और एसटीपी की क्षमता वृद्धि जैसे प्रमुख सुझावों को करीब दस साल बीतने के बाद भी लागू नहीं किया जा सका है।
सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है, “2017-18 के हमारे पिछले निष्पादन ऑडिट के बाद से कार्यक्रम गतिविधियों की योजना, क्रियान्वयन तथा संचालन एवं रखरखाव में कमियां पाई गई हैं, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि राज्य सरकार गंगा में बिना उपचारित सीवेज के प्रवाह को रोकने के मुख्य लक्ष्य को हासिल करने में विफल रही है।
