लखनऊ सीएसआई आर-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-एनबीआरआई), लखनऊ में आज दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ” पौधों के विकास और तनाव की प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने वाले हार्मोनल क्रॉस-टॉक पर” का शुभारम्भ हुआ। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी), भारत सरकार तथा अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एएनआरएफ) के सहयोग से आयोजित इस संगोष्ठी में देशभर के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, शिक्षाविद्, शोधकर्ता, संकाय सदस्य एवं विद्यार्थी एकत्रित हुए हैं। संगोष्ठी का उद्देश्य पौध हार्मोन सिग्नलिंग, विकासीय जीवविज्ञान तथा तनाव अनुकूलन के क्षेत्र में हो रहे नवीनतम अनुसंधानों पर विचार-विमर्श एवं वैज्ञानिक संवाद को बढ़ावा देना है।
संगोष्ठी के उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि डॉ. त्रिलोचन मोहपात्रा, अध्यक्ष, पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण (पीपीवी एंड एफआरए), कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार थे।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में सीएसआईआर-एनबीआरआई के निदेशक डॉ. अजीत कुमार शासनी ने मुख्य अतिथि, देशभर से पधारे वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, प्रतिभागियों एवं अन्य विशिष्ट अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने अपने स्वागत उद्बोधन में संस्थान के गौरवशाली इतिहास, प्रमुख वैज्ञानिक उपलब्धियों तथा पादप विज्ञान, प्रौद्योगिकी विकास एवं जैव विविधता संरक्षण के क्षेत्र में संस्थान के महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने संस्थान द्वारा हाल के वर्षों में विकसित किए गए नवीन थीम आधारित उद्यानों, अत्याधुनिक अनुसंधान सुविधाओं एवं अन्य अवसंरचनात्मक विकास कार्यों की जानकारी देते हुए कहा कि ये पहल वैज्ञानिक अनुसंधान, जर्मप्लाज्म संरक्षण, जन-जागरूकता तथा पर्यावरण संरक्षण को नई दिशा प्रदान कर रही हैं और सीएसआईआर-एनबीआरआई को देश के अग्रणी वनस्पति अनुसंधान संस्थानों में सुदृढ़ स्थान दिला रही हैं।
संगोष्ठी के संयोजक एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. समीर वी. सावंत ने संगोष्ठी की अवधारणा, उद्देश्यों तथा वैज्ञानिक महत्त्व की जानकारी दी। उन्होंने दो दिवसीय कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित होने वाले विभिन्न तकनीकी सत्रों, मुख्य व्याख्यानों, पोस्टर प्रस्तुतियों एवं वैज्ञानिक परिचर्चाओं का विस्तृत परिचय देते हुए प्रतिभागियों से सभी सत्रों में सक्रिय सहभागिता कर वैज्ञानिक संवाद एवं सहयोग को सशक्त बनाने का आह्वान किया।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में मुख्य अतिथि डॉ. त्रिलोचन मोहपात्रा ने देश की उभरती चुनौतियों के समाधान में पादप संसाधनों एवं पादप-आधारित समाधानों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत की बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए आने वाले वर्षों में खाद्य सुरक्षा, पोषण सुरक्षा तथा स्वास्थ्य सुरक्षा देश की प्रमुख प्राथमिकताएँ होंगी। उन्होंने कहा कि बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य के कारण ऊर्जा सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में उभरकर सामने आई है। ऐसे समय में पादप-आधारित समाधान इन राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता से लेकर जैव-ईंधन (बायोफ्यूल) जैसे क्षेत्रों तक पादप संसाधनों ने देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
डॉ. मोहपात्रा ने आधुनिक जीन एडिटिंग एवं अन्य जैव-प्रौद्योगिकी तकनीकों के कारण पादप विज्ञान के क्षेत्र में आए क्रांतिकारी परिवर्तनों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन तकनीकों ने पौधों की वृद्धि, विकास एवं तनाव प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने वाले विभिन्न जीनों, फाइटोहॉर्मोनों तथा उनके पारस्परिक संबंधों की समझ को नई ऊँचाई प्रदान की है। उन्होंने कहा कि पादप प्रजनन कार्यक्रमों के माध्यम से विकसित नवीन किस्मों के कारण चावल एवं गन्ने जैसी प्रमुख फसलों की उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि पादप विज्ञान अनुसंधान में किया गया छोटा-सा निवेश भी भविष्य में देश के लिए बड़े परिणाम लेकर आ सकता है। उन्होंने किसानों को देश की कृषि-जैव विविधता का वास्तविक संरक्षक बताते हुए उनके अधिकारों के संरक्षण एवं सतत कृषि विकास के लिए आवश्यक प्रयासों पर विशेष बल दिया।
उद्घाटन सत्र के उपरांत प्रथम तकनीकी सत्र “हार्मोनल एवं विकासीय नियमन” आयोजित किया गया, जिसमें देश के विभिन्न प्रमुख अनुसंधान संस्थानों के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने अपने व्याख्यान प्रस्तुत किए। प्रथम वैज्ञानिक व्याख्यान में डॉ. अजीत कुमार शसान्य ने “सेकेंडरी मेटाबोलाइट्स: इंटरनल इम्यूनिटी ऑफ प्लांट्स” विषय पर व्याख्यान देते हुए पौधों की प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली में द्वितीयक उपापचयों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। डॉ. देबाशीष चट्टोपाध्याय (एनआईपीजीआर, नई दिल्ली) ने अजैविक तनाव के दौरान ब्रैसिनोस्टेरॉयड्स द्वारा लिग्निन संचयन एवं जड़ विकास के नियमन पर अपने शोध निष्कर्ष प्रस्तुत किए। डॉ. आलोक के. सिन्हा (एनआईपीजीआर) ने साइटोसोलिक एमएपीके (MAPK) सिग्नलिंग की क्लोरोप्लास्ट प्रोटीन आयात एवं प्रकाश संश्लेषण दक्षता में भूमिका स्पष्ट की, जबकि डॉ. अशोक के. गिरी (सीएसआईआर-एनसीएल, पुणे) ने फ्लेवोनॉयड ग्लाइकोसाइड्स की ऑक्सिन परिवहन एवं जड़ विकास में भूमिका पर प्रकाश डाला।
अपराह्न तकनीकी सत्र में प्रो. मनोज प्रसाद (एनआईपीजीआर) ने कैल्शियम सिग्नलिंग एवं वायरल रोगजनन, डॉ. मनोज माजी (एनआईपीजीआर) ने बीज परिपक्वता एवं निर्जलीकरण सहनशीलता में एबीए (ABA) सिग्नलिंग तथा डॉ. ईश्वरैया रामिरेड्डी (आईआईएसईआर तिरुपति) ने टमाटर में साइटोकाइनिन सिग्नलिंग की ऊतक-विशिष्ट भूमिका एवं रोग प्रतिरोध पर अपने शोध प्रस्तुत किए।
सीएसआईआर की विभिन्न प्रयोगशालाओं के वैज्ञानिकों ने भी अपने महत्वपूर्ण अनुसंधान साझा किए। डॉ. सुमित कुमार घोष (सीएसआईआर-सीमैप) ने फाइटोहॉर्मोन नियंत्रित कीटनाशी डाइटरपेनॉयड्स के जैवसंश्लेषण, डॉ. विवेक डोगरा (सीएसआईआर-आईएचबीटी) ने तनाव प्रतिक्रियाओं में क्लोरोप्लास्ट-व्युत्पन्न ऑक्सीलिपिन सिग्नलिंग तथा डॉ. राजेश कुमार सिंह (सीएसआईआर-आईएचबीटी) ने केसर में तापमान-निर्भर पुष्पन के दौरान शर्करा सिग्नलिंग की भूमिका पर अपने शोध निष्कर्ष प्रस्तुत किए।
दिनभर की वैज्ञानिक चर्चाओं का समापन डॉ. अनिरुद्ध पी. साने (सीएसआईआर-एनबीआरआई) के मुख्य व्याख्यान “द हार्मोनल कैलाइडोस्कोप: हाउ स्मॉल चेंजेज मेक बिग डिफरेंसेज़ इन ग्रोथ प्रोसेसेज़” के साथ हुआ, जिसमें उन्होंने विस्तार से बताया कि किस प्रकार हार्मोनों के सूक्ष्म परिवर्तन एवं उनकी पारस्परिक क्रियाएँ पौधों की जटिल विकासीय प्रक्रियाओं का संचालन करती हैं।
सायंकाल आयोजित पोस्टर प्रस्तुति सत्र में युवा शोधकर्ताओं एवं विद्यार्थियों ने अपने अनुसंधान कार्य प्रस्तुत किए तथा देशभर से आए अग्रणी वैज्ञानिकों के साथ वैज्ञानिक चर्चा एवं विचारों का आदान-प्रदान किया।
इस अवसर पर डॉ. त्रिलोचन महापात्र ने, सीएसआईआर-एनबीआरआई अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष के रूप में, संस्थान के वानस्पतिक उद्यान में स्थापित ‘वन-विलास’ बोगनवेलिया जर्मप्लाज्म संग्रह का उद्घाटन किया। इस अवसर पर डॉ. अजीत कुमार शासनी भी उपस्थित रहे। अनुसंधान, जर्मप्लाज्म संरक्षण, शिक्षा एवं सजावटी बागवानी के लिए विकसित इस राष्ट्रीय संसाधन केंद्र में बोगनवेलिया की 400 से अधिक किस्मों का संरक्षण किया गया है, जो इसे भारत का सबसे बड़ा बोगनवेलिया जर्मप्लाज्म संग्रह बनाता है। इस अवसर पर उन्होंने संस्थान के के.एन. कौल ब्लॉक में विकसित नवीन सम्मेलन कक्ष ‘अपराजिता’ का भी उद्घाटन किया।
संगोष्ठी में सीएसआईआर की विभिन्न प्रयोगशालाओं, आईआईएसईआर, एनआईपीजीआर, आईसीजीईबी, विश्वविद्यालयों तथा अन्य प्रमुख अनुसंधान संस्थानों के वैज्ञानिकों की उत्साहपूर्ण सहभागिता रही, जिससे वैज्ञानिक सहयोग एवं ज्ञान के आदान-प्रदान को नई दिशा मिली।
राष्ट्रीय संगोष्ठी का दूसरा दिन 16 जुलाई 2026 को जीनोमिक्स, जीन नियमन, जैव प्रौद्योगिकी, तनाव जीवविज्ञान एवं पोषक तत्व सिग्नलिंग विषयों पर तकनीकी सत्रों के साथ आयोजित होगा, जिसके पश्चात सायंकाल समापन समारोह आयोजित किया जाएगा।
