प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी संपत्ति पर किसी पक्ष का वास्तविक कब्जा है, तो उसे BNSS की धाराओं 164/165 के तहत बेदखल नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसी कार्रवाई केवल सक्षम सिविल अदालत के विधिक आदेश से ही संभव है।
न्यायमूर्ति बृज राज सिंह ने अपने फैसले में कहा कि राज्य का कर्तव्य है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखे और पक्षकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करे, लेकिन यदि किसी संपत्ति पर किसी व्यक्ति का वास्तविक कब्जा है, तो उसे BNSS के तहत हटाया नहीं जा सकता जब तक कि अदालत का स्पष्ट आदेश न हो।
मामले का विवरण:
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि विपक्षी पक्ष उसकी जमीन पर अवैध कब्जा करने की कोशिश कर रहा है, जबकि वह स्वयं उस संपत्ति पर काबिज है। इस संबंध में उसने जिला मजिस्ट्रेट, गोंडा के समक्ष आवेदन भी दिया। पुलिस रिपोर्ट में कहा गया कि संपत्ति को लेकर विवाद है और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका है, इसलिए धारा 165 के तहत संपत्ति कुर्क (अटैच) करने की सिफारिश की गई। इसके बाद सिटी मजिस्ट्रेट ने दुकान को अटैच कर दिया।
हालांकि, इस आदेश को चुनौती देते हुए प्रतिवादी ने पुनरीक्षण याचिका दायर की, जिसमें अटैचमेंट का आदेश रद्द कर दिया गया। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
दोनों पक्षों के तर्क:
याचिकाकर्ता का कहना था कि केवल इस आधार पर कि सिविल अदालत में मुकदमा दायर नहीं किया गया, BNSS की कार्यवाही समाप्त नहीं की जा सकती।
वहीं, प्रतिवादी का तर्क था कि जब कब्जा स्पष्ट है, तो ऐसे मामलों में निष्कासन के लिए सिविल कोर्ट का सहारा लिया जाना चाहिए, न कि BNSS के तहत कार्रवाई की जाए।
हाईकोर्ट का फैसला:
हाईकोर्ट ने पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जहां कब्जा स्पष्ट रूप से किसी एक पक्ष के पास है, वहां BNSS की धाराओं 164/165 के तहत कार्रवाई करना उचित नहीं है। अदालत ने पाया कि संबंधित दुकान पर विपक्षी पक्ष का वास्तविक कब्जा था, इसलिए अटैचमेंट की कार्रवाई गलत थी।
इसी आधार पर अदालत ने पुनरीक्षण अदालत के आदेश को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी।

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