“वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत की विदेश नीति पर मंथन, सुविवि में जुटे देशभर के दिग्गज”

दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार संपन्न, कुलपति बोले—नई पीढ़ी को कूटनीतिक सोच से लैस करना समय की मांग

आजमगढ़ महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय के राजनीतिक विज्ञान विभाग एवं भारतीय राजनीतिक विज्ञान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में “आत्मनिर्भर भारत अभियान” के अंतर्गत आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार “भारत की विदेश नीति का विकास एवं चुनौतियां” विषय पर सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। 07 व 08 अप्रैल को आयोजित इस महत्वपूर्ण अकादमिक आयोजन में देशभर के ख्यातिप्राप्त शिक्षाविदों, विशेषज्ञों और शोधार्थियों ने भाग लेकर समकालीन वैश्विक परिदृश्य पर गंभीर विमर्श किया।
सेमिनार का मुख्य उद्देश्य तेजी से बदल रहे अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य, विशेषकर अमेरिका–इज़राइल–ईरान जैसे वैश्विक तनावों के बीच भारत की विदेश नीति की दिशा, रणनीति और चुनौतियों का विश्लेषण करना रहा। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि वर्तमान समय में कूटनीति केवल सीमाओं तक सीमित नहीं, बल्कि आर्थिक, सामरिक और तकनीकी आयामों से भी गहराई से जुड़ चुकी है।
इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश के अनेक प्रतिष्ठित शिक्षाविदों ने अपने विचार रखे। प्रमुख वक्ताओं में राजीव गांधी राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, पंजाब के कुलपति प्रो. जयशंकर सिंह, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक के पूर्व कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी, सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. रजनीकांत पांडेय सहित कई वरिष्ठ विद्वान शामिल रहे। इसके अतिरिक्त विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार के सलाहकार डॉ. ए.एन. राय, भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन संतोष कुमार त्रिपाठी, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रो. तेज प्रताप सिंह, गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रो. विनोद कुमार सिंह, बसंत कन्या महाविद्यालय, वाराणसी की प्रो. रचना श्रीवास्तव, श्रीकृष्ण गीता पीजी कॉलेज के प्राचार्य प्रो. ऋषिकेश सिंह, गांधी त्रिवेदी स्मारक महाविद्यालय के प्रो. अजीत प्रसाद राय, जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय, बलिया की डॉ. रजनी चौबे तथा बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय की डॉ. प्रीति चतुर्वेदी ने अपने विचारों से उपस्थित जनसमूह को समृद्ध किया।

सेमिनार की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. संजीव कुमार ने कहा कि आज का विश्व बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर तेजी से अग्रसर है, जहां हर राष्ट्र अपनी रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने में लगा है। ऐसे समय में भारत की विदेश नीति को संतुलन, सामरिक सूझबूझ और आर्थिक आत्मनिर्भरता के आधार पर आगे बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है।उन्होंने कहा कि भारत न केवल एक उभरती आर्थिक शक्ति है, बल्कि वैश्विक शांति, स्थिरता और सहयोग का भी महत्वपूर्ण पक्षधर है। बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों, विशेषकर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनावों के संदर्भ में भारत को अपनी कूटनीति को अत्यंत संतुलित और दूरदर्शी बनाना होगा, ताकि राष्ट्रीय हितों की रक्षा के साथ-साथ वैश्विक मंच पर उसकी विश्वसनीयता भी बनी रहे।
कुलपति ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि विश्वविद्यालयों को “थिंक टैंक” के रूप में विकसित होना चाहिए, जहां से न केवल ज्ञान का प्रसार हो, बल्कि नीतिगत सोच और शोध आधारित समाधान भी निकलें। उन्होंने कहा कि छात्र-छात्राओं को केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित न रहकर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की व्यावहारिक समझ विकसित करनी चाहिए, जिससे वे भविष्य में नीति-निर्माण और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा सकें।
उन्होंने यह भी कहा कि “आत्मनिर्भर भारत” की अवधारणा तभी साकार होगी, जब देश की विदेश नीति मजबूत, लचीली और समयानुकूल होगी। इसके लिए आवश्यक है कि युवा पीढ़ी वैश्विक घटनाक्रमों के प्रति सजग रहे और उनमें विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण विकसित हो।
सेमिनार के दौरान छात्र-छात्राओं और शोधार्थियों ने भी सक्रिय भागीदारी निभाते हुए विभिन्न सत्रों में प्रश्नोत्तर के माध्यम से अपने विचार व्यक्त किए। आयोजन ने न केवल अकादमिक वातावरण को समृद्ध किया, बल्कि प्रतिभागियों को वैश्विक कूटनीति की गहन समझ भी प्रदान की। संगोष्ठी में विभिन्न राज्यों से आए हुए शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए और सर्वश्रेष्ठ शोध- पत्रों को पुरस्कृत भी किया गया।
आयोजन समिति के सदस्य—सूर्य प्रकाश अग्रहरि, डॉ. दीक्षा उपाध्याय, शुभम राय एवं त्रिशिका श्रीवास्तव—ने प्रशासनिक अधिकारियों, कर्मचारियों एवं छात्रों के सहयोग से कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।कार्यक्रम के प्रथम सत्र का कुशल संचालन पत्रकारिता विभाग के प्रभारी नितेश सिंह द्वारा किया गया एवं समापन सत्र का संचालन हिंदी विभाग की डॉ० निधि सिंह द्वारा किया गया जिन्होंने पूरे आयोजन को प्रभावी और सुव्यवस्थित ढंग से संचालित किया।

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