चंपत रायचंपत राय

लखनऊ/अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट और देश के शीर्ष प्रशासनिक हलकों के बीच एक अभूतपूर्व गतिरोध सामने आया है। राम मंदिर के चढ़ावे में कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के बीच, ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय बंसल ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) द्वारा जिला प्रशासन के माध्यम से मांगे गए वित्तीय विवरण को देने से साफ इनकार कर दिया है।

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इस कदम को प्रशासनिक हलकों में बेहद आक्रामक रूप में देखा जा रहा है क्योंकि ट्रस्ट ने न केवल जिला मजिस्ट्रे बल्कि परोक्ष रूप से पीएमओ के निर्देश को भी ठेंगा दिखा दिया है।

क्या है पूरा मामला
मामले की शुरुआत स्थानीय भाजपा नेता डॉ. रजनीश सिंह की एक शिकायत से हुई। उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को पत्र लिखकर मांग की थी कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की स्थापना से लेकर अब तक के

आय-व्यय का पूरा लेखा-जोखा

भक्तों द्वारा दिए गए दान का विवरण

ट्रस्ट के सभी बैंक खातों की जानकारी

जमीन के लेन-देन और ट्रस्ट की कुल संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक किया जाए।

शिकायत की संवेदनशीलता को देखते हुए, पीएमओ ने इस पत्र को तत्काल कार्रवाई और रिपोर्ट के लिए अयोध्या डीएम को संदर्भित कर दिया।

ट्रस्ट का रु: SIT जांच की आड़
जब जिला प्रशासन ने पीएमओ के निर्देश पर ट्रस्ट से इन वित्तीय दस्तावेजों और ब्योरे की मांग की तो ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने बेहद सख्त रुख अख्तियार कर लिया। चंपत राय ने जिला प्रशासन को वित्तीय जानकारी सौंपने से साफ मना कर दिया।

चंपत राय का तर्क– ट्रस्ट ने इस इनकार के पीछे वर्तमान में चल रही विशेष जांच दल (SIT) की जांच का हवाला दिया है। उनका कहना है कि मामला पहले से ही जांच के अधीन है इसलिए इस मोड़ पर वित्तीय विवरण साझा नहीं किए जा सकते।

खड़े हो रहे हैं कई गंभीर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने राम मंदिर के वित्तीय प्रबंधन और पारदर्शिता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। एक पेशेवर और राजनीतिक दृष्टिकोण से इसके कई गंभीर निहितार्थ हैं

सवाल प्रशासनिक और सामाजिक प्रभाव
पारदर्शिता पर वार देश-विदेश के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और गाढ़ी कमाई के दान से बने इस ट्रस्ट की जवाबदेही क्या किसी भी सरकारी या प्रशासनिक निकाय के प्रति नहीं है?

प्रशासनिक टकराव क्या कोई धार्मिक ट्रस्ट देश के PMO और प्रशासन DM के समन्वय से ऊपर हो सकता है

SIT जांच का बहाना– जानकारों का मानना है कि SIT जांच का हवाला देकर ब्योरा छिपाना पारदर्शिता के सिद्धांतों के खिलाफ है। जांच के दौरान भी प्रशासनिक अधिकारियों को तथ्य उपलब्ध कराना अनिवार्य होता है।

साख पर दांव
राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी के आरोपों ने पहले ही ट्रस्ट की छवि को प्रभावित किया था और अब पीएमओ की पहल पर भी जानकारी देने से इनकार करना आग में घी डालने जैसा है। चंपत राय बंसल के इस अड़ियल रुख के बाद अब गेंद वापस जिला प्रशासन और पीएमओ के पाले में है। देखना यह होगा कि क्या शासन इस पर कोई सख्त रुख अपनाता है या फिर आस्था के नाम पर वित्तीय गोपनीयता का यह खेल यूं ही चलता रहेगा ।

वही विश्वस्त सूत्रों की माने तो एस आई टी के गठन हो जाने के बाद बीजेपी नेता रजनीश सिंह शिकायत की थी एस आई टी जांच के दौरान प्रशाशनिक अधिकारियो जिलाधिकारी और अपर जिलाधिकारी के अभिलेख मांगने पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा होना स्वाभाविक है l

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