13 दिसंबर 2009 को डिस्पैच नंबर 67 पर प्रदीप दुबे ने लिया वी आर एस डिस्पैच नंबर 68 पर बने प्रमुख सचिव संसदीय और उसी दिन अस्थाई रूप से विधानसभा के प्रमुख सचिव का चार्ज भी ले लिया11 जनवरी 2011 को एक अधिसूचना जारी का लोक सेवा आयोग के भर्ती करने के अधिकार को विधानसभा को दे दिया इस अधिसूचना पर भी प्रमुख सचिव संसदीय और प्रमुख सचिव विधानसभा के रूप में प्रदीप दुबे के हस्ताक्षर है।
6 मार्च2012 को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के परिणाम आ रहे थे तब प्रदीप दुबे विधानसभा में अपनी नियुक्ति का फर्जी खेल कर रहे थे। भ्रष्टाचार को लेकर हजरतगंज कोतवाली और लोक सेवा आयोग के अधिकार में फर्जी तरीके से हस्तक्षेप करने पर प्रयागराज के सिविल लाइंस थाने में मुकदमा दर्ज करने को तहरीर दी गई है

उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव पद पर प्रदीप दुबे की नियुक्ति, सेवा अवधि, कथित सेवा विस्तार, नियमावली में संशोधन तथा भर्ती प्रक्रिया से जुड़े आरोप अब केवल प्रशासनिक विवाद नहीं रह गए हैं। यह मामला संवैधानिक व्यवस्था, विधि के शासन, प्रशासनिक जवाबदेही और राजनीतिक उत्तरदायित्व से जुड़े गंभीर प्रश्नों का विषय बन चुका है। जिस पद से विधानसभा की कार्यप्रणाली, भर्ती, प्रशासनिक निर्णय और कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं प्रभावित होती हों, वहां पारदर्शिता और वैधता का प्रश्न और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
विधानसभा में प्रमुख सचिव के पद पर अपने ही कलम से अपने आप को तीन बार नियुक्त करने वाले प्रदीप दुबे 6 मार्च 2012 को जिस दिन प्रमुख सचिव बनते हैं वह समय ऐसा था कि उत्तर प्रदेश में आचार संहिता लगी हुई थी ऐसे समय ना तो नियुक्ति न तो स्थानांतरण हो सकता है प्रदीप दुबे 6 मार्च को तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर की सहमति से प्रमुख सचिव विधानसभा बनते हैं लेकिन अत्यंत हास्यास्पद एवं आपराधिक मामला यह है कि 6 मार्च को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की मतगणना हो रही थी और सुखदेव राजभर उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद के जिला मुख्यालय पर थे और वह दीदारगंज विधानसभा क्षेत्र से अपने चुनाव की काउंटिंग करवा रहे थे ऐसे में यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि प्रदीप दुबे के द्वारा सुखदेव राजभर के फर्जी हस्ताक्षर से अपनी नियुक्ति की गई है यह मामला बहुत बड़े भ्रष्टाचार का है। यह सोचने का विषय है कि जिस दिन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के परिणाम आ रहे थे उस दिन उत्तर प्रदेश के विधानसभा में प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे किसकी सहमति से नियुक्त किए जा रहे थे वह भी आचार संहिता के दौरान।प्रदीप दुबे की नियुक्ति को इन्हीं तमाम आधारों पर चुनौती दी गई है।हाल ही में लखनऊ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा इस मामले में याचिका स्वीकार कर नोटिस जारी किए जाने के बाद यह विवाद और अधिक चर्चा में आ गया है। अब यह प्रश्न केवल इतना नहीं रह गया है कि प्रदीप दुबे की नियुक्ति वैध है या नहीं, बल्कि यह भी है कि यदि इतने गंभीर आरोप वर्षों से लगाए जा रहे थे तो राज्य सरकार ने अब तक स्वतंत्र जांच क्यों नहीं कराई। यही कारण है कि यह प्रकरण अब केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति तक सीमित न रहकर शासन की संवेदनशीलता और जवाबदेही की परीक्षा बन गया है।

प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति और सेवा अवधि पर बड़ा सवाल

सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट रीना एन सिंह द्वारा याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रदीप दुबे की प्रमुख सचिव पद पर नियुक्ति और सेवा अवधि से जुड़े आधिकारिक अभिलेखों में गंभीर विसंगतियां हैं। दावा किया गया है कि विभिन्न मंचों पर नियुक्ति की अलग-अलग तिथियां प्रस्तुत की गई हैं तथा उनकी आयु 70 वर्ष से अधिक होने के बावजूद वे बिना किसी वैधानिक सेवा विस्तार के पद पर बने हुए हैं। यदि किसी सार्वजनिक पद पर नियुक्ति से जुड़े मूल दस्तावेजों में ही विरोधाभास हों, तो यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्न बन जाता है। रीना एन सिंह ने बताया कि
यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल सेवा नियमों का मामला नहीं होगा, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और संवैधानिक मर्यादाओं से जुड़ा गंभीर प्रश्न भी होगा। किसी भी सरकारी या विधायी पद पर बने रहने के लिए वैधानिक आधार स्पष्ट होना चाहिए, क्योंकि अस्पष्टता की स्थिति में न केवल नियुक्ति की वैधता संदिग्ध होती है, बल्कि उससे जुड़े सभी प्रशासनिक निर्णयों पर भी असर पड़ सकता है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के द्वारा भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

लखनऊ हाईकोर्ट में क्या हुआ?

लखनऊ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने विधानसभा के पूर्व सूचना अधिकारी कर्मेश प्रताप सिंह द्वारा दायर अधिकार-पृच्छा याचिका पर उनकी अधिवक्ता रीना एन सिंह की दलीलों को स्वीकार करते हुए विधानसभा अध्यक्ष और प्रमुख सचिव को नोटिस जारी किया है। अधिकार-पृच्छा याचिका का उद्देश्य यही होता है कि किसी व्यक्ति से यह पूछा जाए कि वह किस वैधानिक अधिकार के तहत किसी सार्वजनिक पद पर बना हुआ है। इसलिए इस याचिका का स्वीकार किया जाना अपने आप में इस विवाद की गंभीरता को दर्शाता है।
याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह ने न्यायालय में तर्क दिया कि प्रमुख सचिव विधानसभा एक सार्वजनिक पद है। इसलिए यदि किसी व्यक्ति की नियुक्ति या पद पर बने रहने की वैधता पर प्रश्न उठता है, तो न्यायालय यह पूछ सकता है कि वह किस वैधानिक अधिकार के तहत उस पद पर कार्यरत है। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक संबंधित अधिकारी को ऐसे अधिकारों के प्रयोग से रोका जाना चाहिए जिनका प्रभाव प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ सकता है।
उन्होंने यह भी आग्रह किया कि अंतिम निर्णय तक प्रदीप दुबे को प्रशासनिक और आधिकारिक शक्तियों के प्रयोग से रोका जाए तथा उनकी नियुक्ति के प्रभाव को स्थगित किया जाए। यह मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यदि विवादित नियुक्ति के दौरान कोई प्रशासनिक निर्णय लिए जाते हैं, तो बाद में उनकी वैधता पर भी सवाल उठ सकते हैं।

प्रदीप दुबे के अधिवक्ताओं की दलीलों ने ही प्रदीप दुबे को फंसा दिया

सुनवाई के दौरान प्रदीप दुबे के अधिवक्ता की ओर से यह तर्क रखा गया कि वे किसी “सार्वजनिक पद” पर नहीं हैं। यह दलील सुनने में भले ही तकनीकी लगे, लेकिन इसके दूरगामी कानूनी और प्रशासनिक परिणाम हो सकते हैं। यदि विधानसभा सचिवालय का प्रमुख सचिव सार्वजनिक पद नहीं माना जाएगा, तो फिर उसके अधिकार, दायित्व और निर्णयों की वैधानिक स्थिति पर भी गंभीर प्रश्न खड़े होंगे।न्यायालय भी इस तर्क को सुनकर अचंभित रह गया और यही तर्क अब सबसे अधिक विवाद का विषय बन गया है। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि विधानसभा सचिवालय का प्रमुख सचिव सार्वजनिक पद पर नहीं माना जाएगा, तो सरकारी वेतन, प्रशासनिक अधिकार, नियुक्तियों में भूमिका और संवैधानिक दायित्वों की वैधानिक स्थिति पर भी गंभीर प्रश्न खड़े होंगे। इसके अलावा यह भी स्पष्ट करना होगा कि फिर ऐसे पद पर बैठा व्यक्ति किस प्रकार सार्वजनिक संसाधनों और प्रशासनिक शक्तियों का उपयोग कर रहा है।
याचिकाकर्ता पक्ष की एडवोकेट रीना का कहना है कि विधानसभा सचिवालय में भर्ती, प्रशासनिक निर्णय और नीतिगत कार्यों में प्रमुख सचिव की प्रत्यक्ष भूमिका होती है। इसलिए यह स्पष्ट रूप से सार्वजनिक पद है और अधिकार-पृच्छा याचिका पूर्णतः विचारणीय है। यदि न्यायालय इस तर्क को स्वीकार करता है, तो यह केवल इस मामले तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में ऐसे अन्य पदों की वैधानिक व्याख्या पर भी असर डाल सकता है।

भर्ती और नियमावली में कथित अनियमितताएं

याचिका और शिकायतों में यह भी आरोप लगाया गया है कि विधानसभा सचिवालय में समीक्षा अधिकारी एवं सहायक समीक्षा अधिकारी की नियुक्तियों में व्यापक अनियमितताएं हुईं। भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता, मेरिट और नियमों का पालन किसी भी सरकारी संस्था की विश्वसनीयता के लिए अनिवार्य होता है। यदि इन प्रक्रियाओं में मनमानी या पक्षपात के आरोप लगते हैं, तो इससे पूरी संस्था की साख प्रभावित होती है।
आरोप यह भी है कि वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आचार संहिता के दौरान सेवा नियमावली में संशोधन किए गए तथा उन्हें विधानसभा के पटल पर विधिवत प्रस्तुत नहीं किया गया। यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह विधायी प्रक्रिया और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों पर गंभीर प्रश्न खड़े करेगा। नियमावली में संशोधन का समय, उसका तरीका और उसकी वैधानिक स्वीकृति—ये सभी पहलू इस विवाद को और अधिक संवेदनशील बनाते हैं।

प्रदीप दुबे पर कर्मचारियों के उत्पीड़न के आरोप

शिकायतों में केवल नियुक्तियों और सेवा विस्तार का मुद्दा ही नहीं है, बल्कि कर्मचारियों के कथित उत्पीड़न, प्रशासनिक दबाव तथा कुछ मामलों में आत्महत्या जैसी घटनाओं की निष्पक्ष जांच की भी मांग की गई है। ऐसे आरोप किसी भी प्रशासनिक ढांचे के लिए बेहद गंभीर होते हैं, क्योंकि वे केवल सेवा शर्तों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि मानवीय और संस्थागत संवेदनशीलता से भी जुड़े होते हैं।इन आरोपों की सत्यता का निर्धारण जांच एजेंसियां और न्यायालय ही करेंगे, लेकिन इतने गंभीर आरोपों का लंबे समय तक बिना व्यापक जांच के बने रहना स्वयं प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाता है। यदि शिकायतें बार-बार की गई हों और फिर भी कोई ठोस कार्रवाई न हुई हो, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या व्यवस्था ने अपनी आत्म-शुद्धि की क्षमता खो दी है।

मुख्यमंत्री की चुप्पी क्यों चर्चा में?

उत्तर प्रदेश सरकार भ्रष्टाचार के विरुद्ध “जीरो टॉलरेंस” नीति का लगातार उल्लेख करती रही है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि यदि किसी वरिष्ठ अधिकारी के विरुद्ध वर्षों से इतने गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं और मामला अब उच्च न्यायालय तक पहुंच चुका है, तो क्या सरकार को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच प्रारंभ नहीं करनी चाहिए थी? मुख्यमंत्री स्तर पर मौन रहना कई लोगों को इसलिए भी असहज कर रहा है, क्योंकि इससे सरकार की घोषित नीति और व्यवहार के बीच अंतर दिखाई देता है।
यह भी उल्लेखनीय है कि शिकायतकर्ताओं का दावा है कि उन्होंने मुख्यमंत्री, राज्यपाल और प्रधानमंत्री सहित विभिन्न संवैधानिक प्राधिकरणों को शिकायतें भेजीं, लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना शेष है। फिर भी, यदि इतने व्यापक स्तर पर शिकायतें पहुंचने के बावजूद कोई ठोस पहल नहीं हुई, तो यह प्रशासनिक संवेदनशीलता और राजनीतिक इच्छाशक्ति दोनों पर सवाल खड़े करता है।

लखनऊ उच्च न्यायालय की भूमिका होगी निर्णायक

वर्तमान स्थिति में यह पूरा विवाद न्यायिक विचाराधीन है। इसलिए अंतिम निष्कर्ष न्यायालय के निर्णय और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निकलेगा। न्यायालय का दायित्व केवल आरोपों की सुनवाई करना नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की वैधानिक स्थिति स्पष्ट और निर्विवाद हो।यदि न्यायालय याचिका में लगाए गए आरोपों को सही मानता है, तो यह उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक ऐतिहासिक निर्णय साबित हो सकता है। वहीं यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो संबंधित पक्षों को भी न्यायिक राहत मिलेगी। किसी भी स्थिति में यह मामला प्रशासनिक संस्थाओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश लेकर आएगा कि पारदर्शिता और वैधता से समझौता लंबे समय तक नहीं चल सकता।

कुल मिलाकर प्रदीप दुबे प्रकरण अब किसी एक अधिकारी का विवाद नहीं रह गया है। यह उत्तर प्रदेश में विधि के शासन, संवैधानिक पदों की वैधता, प्रशासनिक पारदर्शिता, भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता और राजनीतिक जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है। इस विवाद ने यह भी दिखाया है कि जब किसी मामले में समय रहते स्पष्टता नहीं लाई जाती, तो वह धीरे-धीरे संस्थागत संकट का रूप ले लेता है।इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि न्यायालय ने याचिका स्वीकार कर सुनवाई प्रारंभ कर दी है। इसलिए अब पूरे प्रदेश की निगाहें आगामी सुनवाई और न्यायालय के निर्णय पर टिकी हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह प्रकरण केवल आरोपों तक सीमित रहता है या फिर यह प्रशासनिक जवाबदेही की दिशा में एक निर्णायक मोड़ साबित होता है।

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