लखनऊ बेंच ने कहा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) के तहत अदालत के बाहर दिया गया तलाक जैसे तलाक-ए-हसन, कानूनी रूप से वैध है और इसके प्रभावी होने के लिए अदालत की मंजूरी आवश्यक नहीं है।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस सैयद कमर हसन रिजवी की डिवीजन बेंच ने लखनऊ फैमिली कोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि यदि पति और पत्नी दोनों तलाक की प्रक्रिया और उसकी वैधता को स्वीकार करते हैं, तो फैमिली कोर्ट केवल इस आधार पर उन्हें तलाकशुदा घोषित करने से इनकार नहीं कर सकती कि तलाक अदालत के बाहर हुआ था।
हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे निर्विवाद मामलों में फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 7 के तहत फैमिली कोर्ट की भूमिका तलाक की प्रक्रिया का सत्यापन करने और भविष्य के सरकारी रिकॉर्ड के लिए औपचारिक घोषणा (डिक्री) जारी करने तक सीमित है।
