तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच पानी का मुख्य विवाद कावेरी नदी (Cauvery River) के जल के बंटवारे को लेकर है, जो 140 साल से भी ज्यादा पुराना है। दोनों राज्यों के बीच यह संघर्ष मुख्य रूप से तब गहराता है जब मानसून कमजोर होता है और बारिश कम होती है।विवाद के मुख्य कारणऐतिहासिक समझौते यह विवाद ब्रिटिश काल के 1892 और 1924 के समझौतों से जुड़ा है, जिन्हें कर्नाटक अनुचित मानता है। कर्नाटक का तर्क है कि तब मैसूर (कर्नाटक) की तुलना में मद्रास प्रेसीडेंसी (तमिलनाडु) को ज्यादा फायदा पहुंचाया गया था।बारिश की कमी (डिस्ट्रेस पीरियड): सामान्य वर्षों में पानी का बंटवारा आसानी से हो जाता है, लेकिन बारिश कम होने पर कर्नाटक का कहना होता है कि उसके पास अपने पीने और सिंचाई के लिए ही पर्याप्त पानी नहीं है, इसलिए वह तमिलनाडु को पानी नहीं दे सकता।दोनों राज्यों की ज़रूरतें: तमिलनाडु का डेल्टा क्षेत्र कृषि (धान और गन्ने की खेती) के लिए कावेरी पर निर्भर है, वहीं कर्नाटक भी अपने किसानों की सिंचाई और बेंगलुरु शहर के लिए पीने के पानी की मांग करता है।मेकेदातु प्रोजेक्ट (Mekedatu Project): कर्नाटक कावेरी पर मेकेदातु में एक बांध बनाना चाहता है, ताकि बेंगलुरु के लिए पीने का पानी स्टोर किया जा सके, लेकिन तमिलनाडु इसका विरोध करता है क्योंकि उसे लगता है कि इससे उसका पानी नियंत्रित हो जाएगा।कानूनी और प्रशासनिक कदमकावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT): सालों की खींचतान के बाद केंद्र सरकार ने न्यायाधिकरण बनाया जिसने पानी के बंटवारे का फॉर्मूला तय किया।सुप्रीम कोर्ट का फैसला: वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कर्नाटक का हिस्सा थोड़ा बढ़ाया (बेंगलुरु की पेयजल जरूरतों को देखते हुए) और तमिलनाडु का हिस्सा कुछ कम किया, साथ ही कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) का गठन किया गया।
ताजा तनाव: जब भी नियामक समितियां (जैसे कावेरी जल विनियमन समिति) कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ने का निर्देश देती हैं, कर्नाटक में किसानों और स्थानीय संगठनों द्वारा भारी विरोध प्रदर्शन व रैलियां शुरू हो जाती हैं।
