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समग्र स्वास्थ्य की ओर भारत का कदम होम्योपैथी की बढ़ती भूमिका

*विश्व स्वास्थ्य दिवस विशेष समग्र स्वास्थ्य की ओर भारत का कदम : होम्योपैथी की बढ़ती भूमिका
डॉ. अजय कुमार पाण्डेय
एम.डी., पीएचडी
असिस्टेंट प्रोफेसर
राजकीय श्री दुर्गा जी होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, चंडेश्वर, आजमगढ़*

आजमगढ़ हर वर्ष विश्व होम्योपैथिक दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि स्वास्थ्य केवल रोगमुक्ति का नाम नहीं, बल्कि एक संतुलित और समग्र जीवन की अवस्था है। आज जब दुनिया जीवनशैली जनित रोगों, मानसिक तनाव और कमजोर होती प्रतिरक्षा प्रणाली से जूझ रही है, तब स्वास्थ्य के प्रति दृष्टिकोण को व्यापक बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है।
ऐसे दौर में होम्योपैथी एक वैकल्पिक नहीं, बल्कि पूरक चिकित्सा पद्धति के रूप में तेजी से उभर रही है। यह पद्धति “Similia Similibus Curentur” के सिद्धांत पर आधारित होकर रोग नहीं, बल्कि रोगी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व उसकी शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक दशा को ध्यान में रखकर उपचार करती है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है, जो इसे समग्र स्वास्थ्य की दिशा में प्रासंगिक बनाती है।
गंभीर बीमारियों, विशेषकर कैंसर जैसे रोगों में जहाँ पूर्ण उपचार जटिल होता है, वहाँ पैलिएटिव केयर का महत्व बढ़ जाता है। इस क्षेत्र में होम्योपैथी सहायक भूमिका निभाते हुए रोगियों के दर्द, अनिद्रा, चिंता और उपचार से जुड़े दुष्प्रभावों को कम करने में मदद करती है। इससे न केवल रोगी का शारीरिक कष्ट कम होता है, बल्कि उसका मानसिक संतुलन और आत्मबल भी सुदृढ़ होता है, जो जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाता है।
इसी प्रकार ऑटोइम्यून रोग जैसे रूमेटॉइड आर्थराइटिस, सोरायसिस और ल्यूपस—आज चिकित्सा विज्ञान के सामने बड़ी चुनौती हैं। होम्योपैथी इन रोगों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को संतुलित करने का प्रयास करती है। व्यक्तिगत लक्षणों के आधार पर किया गया उपचार सूजन और दर्द को नियंत्रित करने के साथ-साथ रोग की तीव्रता को कम करने में सहायक हो सकता है।
रोकथाम के स्तर पर भी होम्योपैथी की भूमिका उल्लेखनीय है। बार-बार होने वाले संक्रमण, एलर्जी और सामान्य रोगों में यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत कर पुनरावृत्ति को कम करने में मदद करती है। विशेष रूप से बच्चों और कमजोर प्रतिरक्षा वाले व्यक्तियों के लिए यह एक सुरक्षित और दीर्घकालिक विकल्प के रूप में सामने आई है।
साथ ही, शोध के क्षेत्र में भी होम्योपैथी ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। विभिन्न संस्थाओं द्वारा एनीमिया, अस्थमा और त्वचा रोगों पर किए गए अध्ययन यह संकेत देते हैं कि यह पद्धति साक्ष्य आधारित चिकित्सा के रूप में अपनी विश्वसनीयता को सुदृढ़ कर रही है। हालांकि, यह भी आवश्यक है कि इन अध्ययनों को और व्यापक तथा वैज्ञानिक दृष्टि से सुदृढ़ किया जाए, ताकि इसकी स्वीकार्यता और बढ़ सके।
विश्व स्वास्थ्य दिवस के इस अवसर पर यह स्पष्ट है कि “स्वस्थ भारत” का सपना केवल एक चिकित्सा पद्धति से पूरा नहीं हो सकता। इसके लिए पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा प्रणालियों के बीच संतुलित समन्वय आवश्यक है। होम्योपैथी इस समन्वय में एक महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है, बशर्ते इसे वैज्ञानिक अनुसंधान और व्यावहारिक उपयोग के साथ आगे बढ़ाया जाए।
अंततः, स्वास्थ्य का अर्थ केवल उपचार नहीं, बल्कि रोकथाम, संतुलन और जीवन की गुणवत्ता से है। यदि हम समग्र दृष्टिकोण अपनाते हैं, तो “स्वस्थ भारत – सशक्त भारत” का लक्ष्य केवल एक नारा नहीं, बल्कि वास्तविकता बन सकता है।

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