फर्जी चकबंदी आदेश से 120 बीघा जमीन हड़पने की कोशिश, 4 के खिलाफ FIR; 7 अफसर जांच के घेरे में
लखनऊ में करीब 120 बीघा सरकारी जमीन को फर्जी चकबंदी आदेश के जरिए भूमाफिया के कब्जे में देने के मामले का खुलासा हुआ है। जमीन की अनुमानित कीमत करीब 2000 करोड़ रुपये बताई जा रही है। मामले में चार लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराई गई है, जबकि चकबंदी विभाग के सात अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की सिफारिश की गई है।
चकबंदी आयुक्त डॉ. ऋषिकेश भास्कर यशोध ने जिलाधिकारी की जांच रिपोर्ट में फर्जीवाड़े का खुलासा होने के बाद कार्रवाई की प्रक्रिया का दिया निर्देश.
अब जांच का फोकस इस बात पर है कि फर्जी चकबंदी आदेश कैसे तैयार हुआ, सरकारी जमीन को कब्जे में लेने की कोशिश में कौन-कौन लोग शामिल थे और विभागीय स्तर पर किसकी भूमिका रही।
घटना की पृष्ठभूमि
38 साल पहले भूमाफिया ने चकबंदी विभाग का फर्जी आदेश बनवाया। इसका इस्तेमाल कर उसने छह गांवों की 120 बीघा सरकारी जमीन पर कब्जा किया और उसका बड़ा हिस्सा बेच भी दिया। इन जमीनों की कीमत 2,000 करोड़ रुपये मानी जा रही है। महकमे के अफसर और कर्मचारी भूमाफिया के दावे को सही मानते हुए उसके पक्ष में आदेश करते रहे।
इस बीच, भूमाफिया इन जमीनों को खतौनी में दर्ज करवाने के लिए साल 2020 में हाई कोर्ट पहुंच गया। वहां दस्तावेज का सत्यापन किया गया तो मामला खुल गया। अब चकबंदी विभाग ने 7 अफसरों के खिलाफ विभागीय जांच की सिफारिश की है। इसके साथ ही 1988 से लेकर अब तक इस मामले से जुड़े सभी अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की भी पड़ताल की जाएगी। इस मामले में सोमवार को रामेंद्र कुमार, अमित कुमार, सुनील कुमार और लईक खां के खिलाफ जानकीपुरम थाने में एफआईआर दर्ज करवाई गई है। ये सभी जमीन कब्जाने के खेल में शामिल बताए जा रहे हैं।
भूमाफिया सिकंदर खान ने साल 2020 में हाईकोर्ट में अपील कर कुछ जमीनों को खतौनी में दर्ज किए जाने में हीलाहवाली की शिकायत की। जमीन पर दावों के पक्ष में उसने 1988 के फर्जी आदेश का प्रयोग किया। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट को शक हुआ तो उसने डीएम लखनऊ से उस आदेश को सत्यापित करने का हलफनामा मांगा। इस पर डीएम ने 2021 में पांच सदस्यीय जांच कमिटी बना दी। इसके बाद मामला ठंडा हो गया!
कोर्ट में सुनवाई के दौरान स्टैंडिंग काउंसिल डॉ. कृष्णा सिंह ने 23 जुलाई 2026 को चकबंदी विभाग से जांच कमिटी की रिपोर्ट के बारे में पूछा। जांच में देरी होने के संबंध में लिखित रूप से रेवेन्यू बोर्ड के चेयरमैन, चीफ सेक्रेटरी और प्रिंसिपल सेक्रेटरी (न्याय) को भी सूचित किया। इसके बाद 5 अगस्त 2026 को रिपोर्ट चकबंदी आयुक्त को सौंपी गई। रिपोर्ट के मुताबिक सिकंदर और उसके साथी इस खेल के कर्ता-धर्ता है।
भूमाफिया सिकंदर खान ने पहले से कब्जा की गई कुछ जमीनें 1988 में खतौनी में चढ़वाने की कोशिश की, पर दस्तावेज सही न होने के कारण वह चकबंदी अधिकारी और बदोबस्त अधिकारी चकबंदी के कोर्ट में केस हार गया। इसके बाद उसने उपसंचालक चकबंदी कोर्ट (दोनों से ऊपरी) का फर्जी आदेश तैयार करवा लिया।
जानिए कैसे खुला पूरा मामला
इस फर्जी आदेश से जुड़े दस्तावेज भी चकबंदी कार्यालय के रेकॉर्ड रूम में ‘प्लांट’ करवाए गए, ताकि जांच में फर्जीवाड़ा पकड़ में न आए। लेकिन कोर्ट की सुनवाई की तारीखें मिजिलबंद रजिस्टर में नहीं दर्ज थी। इस रजिस्टर में कोर्ट केस की सारी तारीखें दर्ज होती हैं। ऐसे में सवाल उठा कि जब सुनवाई की तारीख ही नहीं लगी तो फैसला कैसे आ गया? इससे सारा मामला खुल गया।
देवा रोड, बीकेटी, इंदिरानगर और जानकीपुरम में चरागाह और बंजर समेत सरकारी जमीनों की खरीद-फरोख्त की गई। इनमें से कई जमीनें प्राइम लोकेशन पर हैं। कुछ पर तो पक्के निर्माण भी हो चुके हैं।
जांच रिपोर्ट में चकबंदी विभाग के तत्कालीन उप संचालक चकबंदी एसके भट्ट, एसके सिंह, राम मंगल सिंह, चकबंदी अधिकारी शैलेश शाही, सहायक चकबंदी अधिकारी सत्य प्रकाश मिश्रा, बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी दूधनाथ पांडेय और अपर आयुक्त चकबंदी महेंद्र सिंह के खिलाफ विभागीय जांच की सिफारिश की गई!
