6 1
10 / 100 SEO Score

गरुड़पुराणानुसार 7पितृदेवता कौन ??
सनातन धर्म का गरुड़ पुराण सबसे बड़ा ग्रंथ है जो मृत्यु के बाद क्या होता है, यह बताता है। भगवान विष्णु ने गरुड़ जी को यह ज्ञान दिया। इसमें पितृ देवता के बारे में बहुत विस्तार से लिखा है।

लोग समझते हैं पितर माने सिर्फ हमारे दादा परदादा, नहीं। गरुड़ पुराण कहता है – पितर देवता हैं, वे अलग लोक में रहते हैं, उनकी 7 श्रेणियाँ हैं।

पितृ देवता की उत्पत्ति कैसे हुई?
सृष्टि के शुरू में ब्रह्मा जी ने सोचा – मनुष्य मरेंगे, तो उनका हिसाब कौन रखेगा, उनके वंश की रक्षा कौन करेगा? तब ब्रह्मा जी ने अपनी दाहिनी ओर से 7 ऋषियों को प्रकट किया, जो पितरों के देवता बने। वे हैं –

  1. वसु।, 2. रुद्र। 3. आदित्य
    इन्हीं तीनों से 7 गण बने, वही पितृ देवता कहलाए।

गरुड़ पुराण के अनुसार 7 प्रकार के पितृ देवता –

  1. सोमपा पितर –
    जो सोमरस पीते हैं, बड़े पुण्यात्मा होते हैं। ये ब्राह्मणों के पितर हैं। जो ब्राह्मण वेद पढ़ता है, यज्ञ करता है, उसका पितर सोमपा बनता है। ये चंद्रलोक में रहते हैं, इनका काम है – ज्ञानी पुत्रों को आशीर्वाद देना।
  2. हविष्मान पितर –
    जो हवि खाते हैं, यज्ञ की आहुति से तृप्त होते हैं। ये क्षत्रियों के पितर हैं। जो राजा प्रजा की रक्षा करता है, दान देता है, उसका पितर हविष्मान बनता है। ये स्वर्ग में रहते हैं।
  3. आज्यपा पितर –
    जो घी पीते हैं। ये वैश्यों के पितर हैं। जो व्यापारी ईमानदारी से धन कमाता है, दान करता है, उसका पितर आज्यपा बनता है।
  4. सुकालिन पितर –
    जो काल का ज्ञान रखते हैं। ये शूद्रों के, सेवाभावी लोगों के पितर हैं। जो सेवा करता है, उसका पितर सुकालिन बनता है। ये बहुत दयालु होते हैं, जल्दी प्रसन्न होते हैं।
  5. अग्निष्वात्त पितर –
    जो अग्नि में हवन नहीं करते, पर योग करते हैं। ये संन्यासियों के, योगियों के पितर हैं। ये सबसे बड़े पितर हैं, ब्रह्मलोक में रहते हैं। इनको तृप्त करने से मुक्ति मिलती है।
  6. बर्हिषद पितर –
    जो कुशा के आसन पर बैठते हैं। ये सभी गृहस्थों के सामान्य पितर हैं। आपके पिता, दादा, परदादा इसी में आते हैं। यही हमारे घर आते हैं पितृ पक्ष में। इनको ही हम पिंड देते हैं।
  7. कव्यवाड पितर –
    जो कव्य खाते हैं, अर्थात श्राद्ध का भोजन। ये सबसे नीचे के पितर हैं, जो अभी प्रेत योनि से पितर बने हैं, 1 साल के अंदर। इनको बहुत भूख लगती है, इनको पिंड की सबसे ज्यादा जरूरत है। गरुड़ पुराण कहता है – मृत्यु के 1 साल तक जीव प्रेत रहता है, 1 साल बाद पितर बनता है, तब तक उसे हर महीने पिंड देना पड़ता है।

हमारे अपने पितर कौन से लोक में हैं?
गरुड़ पुराण कहता है – मृत्यु के बाद 3 गति –

  • पुण्यात्मा – पितृलोक, फिर स्वर्ग।
  • मध्यम – पितृलोक में 1-2 साल, फिर जन्म।
  • पापी – प्रेतलोक, नरक, फिर पितृलोक भी नहीं मिलता, भटकता है।

पितृलोक चंद्रमा के ऊपर है, वहाँ दिन-रात नहीं, वहाँ हमारे पितर अपने परिवार का इंतजार करते हैं। जब हम श्राद्ध करते हैं तो वहाँ भोजन बनता है, जब हम जल देते हैं तो वहाँ नदी बनती है।

पितृ देवता दिखते कैसे हैं?
गरुड़ पुराण अध्याय 10 में वर्णन है – पितर दो तरह के दिखते हैं

  • दिव्य पितर – सफेद धोती, जनेऊ, चमकता शरीर, हाथ में जल का लोटा, प्रसन्न मुख।
  • प्रेत पितर – काला शरीर, भूखा, प्यासा, रोता हुआ, नग्न। जिसको श्राद्ध नहीं मिला वह ऐसा दिखता है।

पितर क्या खाते हैं?

  • मनुष्य का दिया पिंड उनका शरीर बनता है।
  • तिल और जल उनका जल है।
  • ब्राह्मण को खिलाया भोजन उनका अन्न है।
  • गाय को दिया भोजन उनका दूध है।
  • कौए को दिया भोजन उनकी यात्रा का भोजन है।

पितर नाराज हों तो क्या होता है?
गरुड़ पुराण कहता है – यदि पुत्र श्राद्ध न करे तो पितर श्राप देते हैं – तुम्हारा धन नष्ट हो, तुम्हारा वंश नष्ट हो। इसी को पितृ दोष कहते हैं। घर में बिना कारण झगड़ा, संतान का न होना, बार-बार गर्भपात, नौकरी में रुकावट – ये सब पितृ दोष के लक्षण हैं।

पितर प्रसन्न हों तो क्या होता है?
यदि श्राद्ध किया तो पितर कहते हैं – आयुष्मान भव, धनवान भव, पुत्रवान भव, विद्यावान भव। वे देवताओं से भी पहले आपकी मदद करते हैं। देवता तो पूजा से खुश होते हैं, पितर तो केवल जल से खुश हो जाते हैं।

गरुड़ पुराण में पितरों के लिए क्या करने को कहा?

  1. गया में पिंडदान – गया में पिंड देने से 21 पीढ़ी के पितर मुक्त होते हैं।
  2. हर अमावस्या को तर्पण।
  3. पितृ पक्ष में 16 दिन भोजन।
  4. पीपल पर जल, दीया।
  5. गीता का 7वां अध्याय रोज पढ़ें – यह पितरों को सीधे मोक्ष देता है।

सबसे बड़ा मंत्र पितरों का –
ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः॥

यह गरुड़ पुराण का मंत्र है, रोज सुबह बोलने से पितर तृप्त होते हैं।

*अंत में – पितृ देवता कोई भूत नहीं, कोई डरावनी चीज नहीं। पितृ देवता आपके रक्षक हैं, आपके पहले देवता। पिता ही पहला गुरु, पितर ही पहले देवता। गरुड़ पुराण कहता है – जिस घर में पितरों की पूजा नहीं, उस घर में देवता भी भोजन नहीं करते।

इसलिए हे मनुष्य, पितरों को मत भूलो। वे देवता बनकर तुम्हारी चौखट पर खड़े हैं, बस एक लोटा जल मांग रहे हैं।

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *