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मथुरा के गुरुकृपा कुंज आश्रम में रहने वाले प्रेमानंद महाराज के शिष्य दीपक लोधी की चौथी मंजिल से गिरने के बाद मौत हो गई! पुलिस पहली नजर में इसे आत्महत्या का मामला मान रही है, हालांकि शरीर पर गंभीर चोटों और प्राइवेट पार्ट कटे होने को लेकर भी जांच की जा रही है!
मथुरा के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज के एक शिष्य की मौत का मामला सामने आया है! उनकी पहचान जबलपुर के रहने वाले दीपक लोधी के तौर पर हुई है!
लोधी ने आत्महत्या की है! पुलिस ने भी यही कहा है कि पहली नजर में मामला आत्महत्या का ही लग रहा है! रिपोर्ट में बताया गया कि मथुरा के गुरू कृपा कुंज आश्रम की चौथी मंजिल से गिरने के बाद उनकी जान गई! उनसे सिर और शरीर के अन्य हिस्सों पर गंभीर चोट आई! उनके प्राइवेट पार्ट भी कट गए थे!

पुलिस ने बताया कि सुबह सूचना मिली थी कि शरद अस्पताल में एक व्यक्ति घायल अवस्था में एडमिट कराया गया है! सूचना को संज्ञान में लेते हुए तत्काल जांच की गई तो जानकारी हुई कि वह जबलपुर के रहने वाले दीपक लोधी उर्फ रसिक दुलारी शरण हैं! वो केलिकुंज से जुड़े गुरुकृपा कुंज आश्रम में रहते थे! उन्होंने बताया कि लोधी ने चौथे फ्लोर से कूदकर जान दे दी! उनके परिवार को इसकी सूचना दे दी गई है! शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया है. मामले में आगे की जांच की जा रही है!

महाराज जी का जन्‍म एक बेहद ही गरीब ब्राम्‍हण परिवार में कानपुर उत्‍तर प्रदेश में हुआ था । पीले बाबा(प्रेमानंद जी महाराज) का बचपन का नाम अनिरुद्ध कुमार पाण्‍डेय था । उनके पिताजी का नाम श्री शंभू पाण्‍डेय एवं माताजी का नाम श्रीमती रामा देवी था ।
पीले बाबा के घर में हमेशा से आध्‍यात्‍मिक माहौल रहा । उनके घर में हमेशा संतों व महात्‍माओं का आगमन होता था । जिनके मुख से संकीर्तन व सत्‍संग सुनते-सुनते पीले बाबा के हृदय में बचपन में ही आध्‍यात्‍म का बीज अंकुरित हो गया ।
कक्षा पांचवी तक आते-आते पीले बाबा को सभी प्रकार के चालीसा कंठस्‍थ हो गये । वे नित्‍य प्रति‍ मंदिर जाते और कम से कम 10 से15 प्रकार के चालीसाओं का पाठ करते और ति‍लक लगाकर स्‍कूल पढ़ने जाते ।

बचपन में सत्‍संग श्रवण करने के दौरान पीले बाबा(Premanand ji maharaj) अक्‍सर मन में सोचते कि ये घर के सभी सदस्‍य एक न एक दिन मर जायेंगे तो फिर मेरा इस दुनिया में कौन है । मैं किसके पास रहूंगा, मुझे किसका सहारा रहेगा ।
चूंकि महाराज जी के दादीजी भी संत हुये, फिर उनके पिताजी संत हुये और अब स्‍वयं महाराज जी संत स्‍वरूप धारण करके समाज को जगाने का कार्य कर रहे हैं । शायद अपने पूर्वजों के ही आशीर्वाद से पीले बाबा(Premanand ji maharaj) के मन में यह प्रेरणा हुयी कि मेरे तो सिर्फ भगवान है, इनके अलावा और कोई नहीं ।

इसलिए घर परिवार छोडकर भगवान के पास जाना ही उन्‍हें एकमात्र उपाय समझ में आया।
जब पीले बाबा कक्षा 9वीं में पास हुये तब तक उनका मन पूर्ण रूप से यह निश्‍चय कर चुका था कि उनका इस संसार में सिवाय ईश्‍वर के और कोई नहीं है, इसलिए उन्‍होंने घर छोडने का पूरी तरह से मन बना लिया ।

प्रेमानंद जी महाराज(पीले बाबा) अपनी माता से सबसे अधिक स्‍नेह करते थे इसलिए उन्‍होंने अपने मन की यह बात सबसे पहले अपनी मॉ को बतायी । उन्‍होंने अपनी मॉ से कहा,
अम्‍मा, हमारा मन कहता है कि घर से भागकर भगवान की प्राप्‍ति‍ करें ।

पीले बाबा की मॉ बोली भागकर थोडी ही भगवान मिलते हैं, भगवान को प्राप्‍त करना है तो बैठकर भजन करो । पीले बाबा बोले कि नहीं हमारा मन है कि बाबाजी बन जायें, ये बात सिर्फ आपको बता रहे हैं ।

लेकिन मॉ को लगा कि नन्‍हा बच्‍चा है, किसी संत का सत्‍संग सुन लिया होगा तो मन में ऐसा विचार आया होगा इसलिए ऐसी बात कर रहा है, ऐसा सोचकर वह अपने घर के कामों में व्‍यस्‍त हो गयी ।

पीले बाबा(प्रेमानंद जी महाराज) बताते हैं कि अगले दिन सुबह 03 बजे मेरे मन में ऐसी व्‍याकुलता उठी कि अब बस भगवान के चरणों मे ही प्राण न्‍यौछावर करना है और मात्र १३ वर्ष की उम्र में प्रेमानंद जी महाराज ने घर छोड दिया और निकल गये अनंत यात्रा पर ।

By admin

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