सत्ता का संरक्षण हो तो अफसरशाही बेलगाम हो जाती है। और कार्यवाही का भय न हो तो पुलिस पब्लिक और पत्रकार से बदसलूकी पर उतर जाती है। वर्तमान में यही चल रहा है।
कल बनारस के पत्रकार देवेन्द्र पांडेय के साथ पुलिसिया बदसलूकी इसका मामूली सा नमूना है। कोई ऐसा जिला नहीं जहां पत्रकारों से बदसलूकी, दुर्व्यवहार और उनको फर्जी मुकदमे में फंसाने की साजिश न रची जाती हो।
चंदौली का धानापुर। वहां एक पत्रकार हैं नवनीत सिंह। बकौल नवनीत सिंह, मैं एक जमीन के सौदे में लगा था। जमीन महंगी थी। विरोधियों ने पुलिस से साजिश करके मुझे फंसा दिया और गंभीर धाराओं में मुकदमा करा दिया। अंततः मुझे न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।
जांच अधिकारी का कहना है कि मुझे पता है कि आप पर मुकदमा फर्जी हुआ है, मगर जो पूर्व में जांच अधिकारी ने रिपोर्ट लगाया है, मैं वही लगाऊंगा। मेरी मजबूरी है।
उसी धानापुर के भास्कर संवाददाता हैं मुकेश मौर्या। उन पर भी एक व्यक्ति ने अपने प्रभाव का प्रयोग करके पुलिस की मिलीभगत से धमकी और रंगदारी का आरोप लगाया। पुलिस की जांच में पता चला कि आरोप फर्जी है। मुकेश मौर्या ने फर्जी आरोप लगाने वाले पर मुकदमा करने की मांग को लेकर पत्रकारों संग ज्ञापन सौंपा।
आप अगर पत्रकार हैं तो कभी आजमा कर देख लीजिए। कोई एरागैरा व्यक्ति सिर्फ किसी पत्रकार के खिलाफ बिना सबूत तहरीर दे दे तो पुलिस झट से मुकदमा दर्ज कर देती है। और अगर पत्रकार किसी मामले में पीड़ित है तो उसकी बात अनसुनी कर दी जाती है। उसे टाला जाता है।
वजह यह कि थानेदार, दरोगा पत्रकार को अर्दब में लेने या किसी खबर से खुन्नस खाये पत्रकार को सबक सिखाने के लिए ऐसा करते हैं। ताकि भविष्य में वह दबाव में रहे। और उनके उगाही अभियान या किसी भ्रष्टाचार में बाधक न बने।
कई बार तो पुलिस वाले किसी पत्रकार के विरोधी को ही अपने पाले में लाते हैं और उससे तहरीर दिलवाकर मुकदमा दर्ज करवाते हैं। और ऐसे पुलिस वाले अपने वरिष्ठ अधिकारियों को भी झूठ और मनगढ़ंत फीडबैक देते हैं।
उन्हें पता होता है कि अब वरिष्ठ अधिकारी तो स्वयं जांच तो करेंगे नहीं। पूछेंगे तो हम जो बताएंगे, उस पर ही यकीन करेंगे। और ऐसा ही होता है।
धानापुर की यह कहानी का सार यह भी है कि वहां बालू-मिट्टी का अवैध खनन बड़े पैमाने पर बताया जाता है। जो पत्रकार तेज लगता है, उसे अर्दब में लेने की कहानी रच दी जाती है।
बहरहाल बात यह है कि वर्तमान में पत्रकार सबसे ज्यादा उन पुलिसकर्मियों के टार्गेट पर रहते हैं जो अवैध-अनैतिक धंधों के संरक्षणवादी हों, किसी सत्ताधारी मंत्री-विधायक के करीबी हों।
आज भारत प्रेस की आजादी में यूं ही नहीं पिछड़ा है। इसके पीछे पत्रकारों पर दबाव, हिंसा, राजनीतिक साजिश समेत कई वजहें हैं।
