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लखनऊ  औपनिवेशिक भारत में वन्देमातरम का विरोध पूरी तरह विभाजनकारी राजनीति का हिस्सा था। उ0प्र0 अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम के पूर्व अध्यक्ष एवं सदस्य विधान परिषद् डा.लालजी प्रसाद निर्मल ने कहा है कि वन्दे मारतम का प्रथम विरोध बैरिस्टर सैय्यद अली इमाम जो मुस्लिम लीग के अध्यक्ष रहे ने वर्ष 1909 में अमृतसर अधिवेशन में, तुर्की के खलीफा और उस्मानी राज्य की रक्षा के लिए खिलाफत आन्दोलन चलाने वाले मुस्लिम लीग के 1908 में 

अध्यक्ष रहे मो0 अली जौहर जो वर्ष 1923 में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे ने कांग्रेस के काकीनाड़ा अधिवेशन में वन्दे मातरम् का न केवल विरोध किया बल्कि अध्यक्ष रहते कांग्रेस अधिवेशन का बहिष्कार किया।

यह वही जौहर थे, जिन्होने भारत भूमि की जगह येरूशलम में दफन किए जाने की इच्छा जाहिर की थी और व न तो भारत में मरे और न ही यहां की मिट्टी में दफन हुए। वन्दे मातरम् का विरोध मो0 अली जिन्ना ने 15 अक्टूबर 1937 को लखनऊ में मुस्लिम लीग की बैठक में किया था और इसी कारण कांग्रेस को छोड़ भी दिया था। जिन्ना के विरोध के कारण ही वर्ष 1937 में कांग्रेस ने वन्दे मातरम् के पूर्ण गायन पर रोक लगा दी थी।

डा.निर्मल ने कहा कि मो0 अली जिन्ना और मो0 अली जौहर दोनो ने लन्दन में हुए गोलमेज सम्मेलन में वर्ष 1930 में मुस्लिम के लिए अलग निर्वाचन और सुरक्षा की मांग की जो बाद में भारत विभाजन का आधार बना। 

डा.निर्मल ने कहा कि वन्दे मातरम् का पूर्ण गायन देश के स्वाभिमान, अस्मिता और क्रान्तिकारियों के अमर बलिदान से जुड़ा हुआ है और उसे संवैधानिक मान्यता प्राप्त है। अतः इसका विरोध कदापि उचित नहीं है।

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